भारत का घुमंतू एवं विमुक्त समाज केवल एक सामाजिक समूह नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक स्मृति और संघर्ष की परंपरा का जीवंत हिस्सा रहा है। इतिहास के कई कठिन दौरों में इस समाज ने देश और धर्म की रक्षा के लिए असाधारण साहस और त्याग का परिचय दिया। उनकी जीवनशैली भले ही स्थायी न रही हो, लेकिन समाज और संस्कृति के प्रति उनका योगदान लगातार बना रहा।
मुगल काल में प्रतिरोध की भूमिका
मुगल काल के दौरान जब कई क्षेत्रों में जबरन धर्मांतरण के प्रयास तेज हुए, तब घुमंतू जातियों ने उसका विरोध किया। अपने पारंपरिक कौशल के आधार पर उन्होंने हथियार निर्माण, संदेश पहुंचाने और जासूसी जैसे कार्यों में सहयोग दिया। युद्ध के समय इन समुदायों की भूमिका केवल सहयोगी तक सीमित नहीं रही।
साथ ही, उनके गायन, वादन और प्रदर्शन की परंपराएं सैनिकों के बीच उत्साह और जोश जगाने का माध्यम भी बनीं। इस तरह वे कलाकार होने के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना को बनाए रखने वाले भी बने रहे।
अंग्रेजी शासन में गुरिल्ला संघर्ष
ब्रिटिश शासन के दौरान भी घुमंतू समाज ने अन्याय के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा। कई समुदायों ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीतियों का सहारा लेते हुए अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।
देश और धर्म की रक्षा के लिए इन समुदायों ने स्थायी जीवन का त्याग किया, लेकिन अपनी पहचान और परंपराओं से समझौता नहीं किया। उनका यह प्रतिरोध इतिहास के कई स्थानीय संदर्भों में दर्ज मिलता है।
लोकसंस्कृति के संवाहक बने समुदाय
घुमंतू समाज ने सदियों तक भारत की लोकसंस्कृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके लोकगीत, कथाएं, नृत्य और पारंपरिक ज्ञान आज भी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा माने जाते हैं।
गांव-गांव घूमकर ये समुदाय केवल अपनी आजीविका ही नहीं चलाते थे, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाने और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम भी करते रहे।
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट से बढ़ी मुश्किलें
ब्रिटिश सरकार ने इन समुदायों की गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा और 12 अक्टूबर 1871 को ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लागू किया। इस कानून के तहत कई घुमंतू जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया।
इस फैसले ने उनके सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। कानून के कारण उनकी स्वतंत्रता सीमित हो गई और समाज में उनके प्रति अविश्वास तथा भेदभाव भी बढ़ा।
विमुक्ति के बाद भी जारी रहा विवाद
देश की स्वतंत्रता के बाद 31 अगस्त 1952 को इन समुदायों को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट से मुक्त किया गया। इसी दिन को आज ‘विमुक्त दिवस’ के रूप में याद किया जाता है।
हालांकि उसी समय ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट’ लागू किया गया, जिसमें कुछ समुदायों को स्वभाव से अपराधी मानने की व्यवस्था बनी रही। इस कारण सामाजिक न्याय को लेकर चर्चा और विरोध भी जारी रहा।
कानून खत्म करने की पहल
समय के साथ कई सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं ने इन कानूनों के खिलाफ आवाज उठाई। घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों ने समाज में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया।
इन प्रयासों के बीच वर्ष 2015 में हरियाणा सरकार ने ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट’ को समाप्त कर दिया। इस फैसले के साथ हरियाणा ऐसा कदम उठाने वाला देश का पहला राज्य बना।
स्थायी जीवन की ओर बढ़ता समाज
वर्तमान समय में घुमंतू एवं विमुक्त समाज धीरे-धीरे स्थायी जीवन की ओर बढ़ रहा है। कई परिवार अब सरकारी योजनाओं से जुड़ रहे हैं और उन्हें आधार कार्ड, राशन कार्ड, परिवार पहचान पत्र, पेंशन तथा बच्चों की शिक्षा जैसी सुविधाएं मिलने लगी हैं।
सरकारी आवास योजनाओं के तहत भी ऐसे परिवारों को घर उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उनके जीवन में स्थिरता आ सके।
सामाजिक धारणाओं में बदलाव की कोशिश
इन समुदायों के साथ वर्षों से जुड़ी नकारात्मक धारणाओं को बदलने की दिशा में भी काम हो रहा है। सामाजिक, प्रशासनिक और वैचारिक स्तर पर ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, जिनसे समाज में इनके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सके।
मीडिया, प्रशासन और आम लोगों के व्यवहार में भी धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगा है, जहां भाषा और दृष्टिकोण में संवेदनशीलता बढ़ाने की बात सामने आ रही है।
मुख्य बातें
- भारत का घुमंतू और विमुक्त समाज इतिहास में देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा में अपनी भूमिका के लिए जाना जाता है। मुगल काल में जबरन धर्मांतरण के प्रयासों का इन समुदायों ने विरोध किया और युद्ध व जासूसी जैसे कार्यों में सहयोग दिया।
- अंग्रेजी शासन के दौरान कई घुमंतू समुदायों ने गुरिल्ला रणनीतियों के जरिए ब्रिटिश सत्ता का विरोध किया और अपनी परंपराओं व स्वाभिमान को बनाए रखा।
- 12 अक्टूबर 1871 को ब्रिटिश सरकार ने ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लागू कर कई घुमंतू जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनके सामाजिक जीवन पर गहरा असर पड़ा।
- स्वतंत्रता के बाद 31 अगस्त 1952 को इन समुदायों को इस कानून से विमुक्त किया गया, हालांकि बाद में ‘हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट’ लागू होने से विवाद बना रहा।
- वर्तमान समय में कई घुमंतू और विमुक्त परिवार स्थायी जीवन की ओर बढ़ रहे हैं और उन्हें शिक्षा, पहचान पत्र, पेंशन और आवास जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगा है।
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। इन विचारों का प्रत्यक्ष रूप से संबंध सुबोध चंद्र, प्रांत संगठन मंत्री, विश्व हिंदू परिषद, इंद्रप्रस्थ प्रांत से है।

