रविवार, मई 3, 2026
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राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक शक्तियों पर पूछे 14 सवाल, पूछा– क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य है?

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा विधेयकों को रोकने के मामले में बड़ा फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक कोई बिल नहीं रोक सकते। इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट से 14 सवालों के ज़रिए जवाब मांगा है।

राज्यपाल बनाम सुप्रीम कोर्ट: कहां से शुरू हुआ मामला

इस पूरे विवाद की शुरुआत तमिलनाडु सरकार और वहां के राज्यपाल के बीच बढ़ते टकराव से हुई थी। राज्यपाल ने कई बिलों पर लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 8 अप्रैल को फैसला देते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास किसी भी विधेयक को अनिश्चितकाल के लिए रोकने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के पास भेजे गए बिल पर तीन महीने के भीतर निर्णय लिया जाना चाहिए।

संविधान के अनुच्छेदों से जुड़े राष्ट्रपति के सवाल

राष्ट्रपति मुर्मू ने जो सवाल उठाए हैं, वे संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से संबंधित हैं। सवालों की मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • क्या राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी अनिवार्य है?
  • बिल आने पर राज्यपाल के पास कौन-कौन से संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  • क्या राज्यपाल के फैसले कोर्ट में चुनौती के योग्य हैं?
  • क्या अनुच्छेद 361 न्यायिक समीक्षा को बाधित करता है?
  • क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल के संवैधानिक फैसलों पर समयसीमा निर्धारित कर सकता है?
  • अनुच्छेद 142 के अंतर्गत क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेश बदले जा सकते हैं?
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  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों को लेकर 14 अहम सवाल पूछे हैं।
  • ये सवाल संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से संबंधित हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्यपाल बिल को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोक सकते।
  • राष्ट्रपति ने पूछा है कि क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य हैं, और क्या उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आते हैं।
  • यह मामला तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और अब संवैधानिक व्याख्या की नई बहस को जन्म दे रहा है।
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