काम के घंटों को लेकर देश में बहस कोई नई नहीं है, लेकिन हाल ही में फिर ये चर्चा तेज़ हो गई है — और इस बार वजह है एक ऐसा विज्ञापन, जो जितना फनी है, उतना ही तीखा भी।
पिछले कुछ सालों में हम सबने “वर्क-लाइफ बैलेंस” के नारे तो खूब सुने हैं, लेकिन हकीकत में क्या बदला? बड़े शहरों की आईटी कंपनियों से लेकर छोटे कस्बों के कॉन्ट्रैक्ट जॉब तक, कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि ज़िंदगी और नौकरी के बीच कोई संतुलन बचा है। इसी असंतुलन को बहुत चुटीले अंदाज़ में उठाया है Shark Tank India ने — अपने सीज़न 5 के रजिस्ट्रेशन कैंपेन के ज़रिए।
70 घंटे की बहस, अब मीम बन गई है
कुछ महीने पहले इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने सुझाव दिया था कि भारत के युवाओं को सप्ताह में 70 घंटे काम करना चाहिए ताकि देश आगे बढ़े। उस बयान के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त बहस हुई — किसी ने समर्थन किया तो किसी ने इसे युवा पीढ़ी पर अनावश्यक बोझ बताया।
अब शार्क टैंक के इस विज्ञापन में इसी 70 घंटे वाले मुद्दे को ले लिया गया है, लेकिन एक व्यंग्य के ज़रिए। विज्ञापन में कुछ फर्जी सीईओ इस बात की शिकायत करते दिखते हैं कि अब उन्हें खुद ऑफिस आना पड़ता है, क्योंकि कर्मचारी स्टार्टअप शुरू करने चले गए हैं। कोई कह रहा है कि उसे अब अपना गोल्फ क्लब खुद उठाना पड़ता है क्योंकि असिस्टेंट ने नौकरी छोड़ दी है। और फिर आता है वो लाइन जो सीधा तीर बन जाती है: “काम करते रहो, शादी में भी… अंतिम संस्कार में भी…”
क्या ये सिर्फ मज़ाक है या असल तस्वीर?
शार्क टैंक का ये कैंपेन कई लोगों को एक अच्छा मज़ाक लग सकता है, लेकिन इसकी गहराई को समझा जाए तो यह आज की नौकरीपेशा ज़िंदगी का आइना है। विज्ञापन किसी ब्रांड को नहीं बेचता, बल्कि उस सोच पर कटाक्ष करता है जिसमें ‘ऑफिस पहले, बाकी सब बाद में’ जैसे सिद्धांतों को सामान्य मान लिया गया है।
इस तरह का कंटेंट इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आज के युवा सिर्फ नौकरी के भरोसे नहीं रहना चाहते। वो अपने काम के घंटे तय करना चाहते हैं, मानसिक शांति को प्राथमिकता देना चाहते हैं और सबसे ज़रूरी — उन्हें सिर्फ एक “बॉस की भलाई” तक सीमित नहीं रहना।
वर्क कल्चर की असलियत क्या कहती है?
हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में औसतन एक शहरी कर्मचारी हर हफ्ते 48–50 घंटे काम करता है, लेकिन कई सेक्टरों में ये आंकड़ा 60 घंटे के पार जा रहा है। तनाव, बर्नआउट और मेंटल हेल्थ की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
उदाहरण के तौर पर, 2023 के एक सर्वे में सामने आया कि 75% मिलेनियल्स और Gen Z प्रोफेशनल्स अब वर्क-लाइफ बैलेंस को अपने करियर डिसीजन में सबसे अहम मानते हैं।
क्योंकि ये बहस को फिर से ताज़ा करता है — मज़ाक के ज़रिए, लेकिन गंभीर सवाल पूछते हुए। वो भी एक ऐसे समय में जब ऑफिस कल्चर में ‘ओवरटाइम को समर्पण’ और ‘थक जाना प्रूफ ऑफ़ परफॉर्मेंस’ मान लिया गया है।
शार्क टैंक का कैंपेन कहता है कि शायद अब वक्त आ गया है जब हम नौकरी और ज़िंदगी के रिश्ते को फिर से परिभाषित करें और इसमें कोई बुराई नहीं अगर शुरुआत एक मीम या विज्ञापन से हो।

