गुरूवार, जून 18, 2026
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बिहार चुनाव 2025: क्या दलित वोटर्स बनेंगे विनिंग फैक्टर? एनडीए और महागठबंधन में जोरदार खींचतान

बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार दलित वोटर्स का वोट बैंक सबसे अहम फैक्टर माना जा रहा है। कुल 20 फीसदी हिस्सेदारी वाले दलित वोटर्स को साधने के लिए एनडीए और महागठबंधन दोनों ने अपनी रणनीति बना ली है। एक तरफ एनडीए के पास चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे बड़े चेहरे मौजूद हैं, वहीं कांग्रेस ने दलित समाज से आने वाले राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सीधा संदेश दिया है कि उसका ध्यान इसी वोट बैंक पर है। चुनावी तस्वीर साफ है कि दलित वोटर्स इस बार दोनों खेमों की किस्मत तय कर सकते हैं।

दलित वोट बैंक पर सबकी नजर

बिहार की कुल आबादी में 20 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले दलित वोटर्स चुनावी समीकरण तय करते हैं। रविदास, पासवान और मांझी समुदाय का वोट हर विधानसभा क्षेत्र में असर डालता है। रविदास समाज 31 फीसदी, पासवान 30 फीसदी और मांझी समुदाय 14 फीसदी के साथ दलित तबके का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। यही वजह है कि एनडीए और महागठबंधन दोनों की नजर इन समुदायों पर है। दलित वोटर्स की गोलबंदी सीधे-सीधे चुनाव के नतीजे को प्रभावित करती है और यही वजह है कि दोनों खेमे पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

कांग्रेस का नया दांव

कांग्रेस ने अपने विधायक राजेश राम को बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाकर साफ कर दिया है कि उसका फोकस दलित वोट बैंक पर है। कांग्रेस ने भूमिहार जाति से आने वाले अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर जब यह फैसला लिया, उसी समय यह संकेत मिल गया था। राहुल गांधी भी वाटर अधिकार यात्रा के दौरान राजेश राम के साथ नज़र आए, जिसका मकसद रविदास समाज को साधना था। कांग्रेस का लक्ष्य है कि रविदास समाज, जो बिहार में 31 फीसदी की बड़ी संख्या रखता है, उसके वोट सीधे एनडीए की बजाय महागठबंधन के पाले में जाएं।

एनडीए का भरोसा चिराग और मांझी पर

एनडीए में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे दलित चेहरे पहले से मौजूद हैं। पासवान समाज का बड़ा हिस्सा चिराग के साथ मजबूती से खड़ा रहता है। 2020 के चुनाव में भले ही चिराग ने नीतीश कुमार के खिलाफ रणनीति अपनाई थी, लेकिन इस बार वह एनडीए के साथ हैं। मांझी का भी अपने समाज पर असर है और एनडीए की उम्मीद है कि मुसहर समाज का बड़ा हिस्सा उनके साथ जाएगा। बीजेपी और जेडीयू को भरोसा है कि उनके पुराने सामाजिक समीकरण इस बार भी काम आएंगे।

आरजेडी और भाकपा माले का समीकरण

महागठबंधन की तरफ से आरजेडी अपने पुराने आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 90 के दशक में लालू यादव की पकड़ दलित वोट बैंक पर मजबूत थी, लेकिन समय के साथ इसमें कमी आई। अब तेजस्वी यादव ने भाकपा माले को साथ लेकर इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। शाहाबाद और किला क्षेत्रों में माले के प्रभाव से 2020 और 2024 में महागठबंधन को फायदा मिला। यही वजह है कि इस बार भी तेजस्वी का भरोसा इस गठजोड़ पर है, जिससे दलित वोट बैंक को साधा जा सके।

सीटों का गणित

बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित हैं। मौजूदा विधानसभा में 21 सीटें एनडीए और 17 सीटें महागठबंधन के पास हैं। शेष सीटों पर भी दलित वोटर्स निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बीजेपी और जेडीयू के पास मौजूदा समय में सबसे ज्यादा दलित विधायक हैं। 2025 के चुनाव में दोनों गठबंधनों का मुख्य लक्ष्य इन सीटों के साथ-साथ सामान्य सीटों पर भी दलित वोट बैंक को साधना है। यही वजह है कि दोनों खेमे दलित समाज को लुभाने के लिए हर स्तर पर तैयारी कर रहे हैं।

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  1. बिहार में दलित वोटर्स की हिस्सेदारी 20 फीसदी है, जो चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं।
  2. एनडीए के पास चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे बड़े चेहरे मौजूद हैं।
  3. कांग्रेस ने राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित वोटर्स को साधने की कोशिश की।
  4. आरजेडी ने भाकपा माले को साथ लेकर दलित वोट बैंक में पकड़ मजबूत की।
  5. बिहार की 40 आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित वोटर्स निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
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