रविवार, जनवरी 25, 2026
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Pitru Paksha 2025: पूर्वजों तक कैसे पहुंचता है कौवे को दिया गया भोजन? जानें रामायण से जुड़ी अनोखी मान्यता

हिंदू धर्म में पितृपक्ष का समय पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए बेहद पवित्र माना गया है. इस बार पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर तक रहेगा. इस दौरान लोग तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं. खास बात यह है कि श्राद्ध के बाद भोजन का एक हिस्सा कौवे के लिए भी रखा जाता है. मान्यता है कि कौवे को भोजन अर्पित करने से वह सीधे पितरों तक पहुंचता है. पौराणिक कथाओं में इसका संबंध श्रीराम और ‘काकासुर कथा’ से जुड़ा है, जिसने इस परंपरा को और भी विशेष बना दिया.

पितृपक्ष का महत्व

हिंदू धर्म के शास्त्रों में पितृपक्ष को पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए सबसे अहम माना गया है. इस दौरान घर-परिवार के लोग अपने पितरों को याद करते हैं और श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान करते हैं. यह परंपरा केवल धार्मिक कर्तव्य ही नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी है, जिसमें अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. मान्यता है कि इन दिनों पितरों की आत्माएं पृथ्वी लोक पर आती हैं और अपने वंशजों द्वारा अर्पित भोजन स्वीकार करती हैं.

कौवा क्यों है खास

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक कौवा सीधे पितरों से जुड़ा माना जाता है. उसे पितृदूत यानी संदेशवाहक कहा गया है. श्राद्ध के दिन जब कौवे को भोजन का अंश दिया जाता है और वह भोजन कर लेता है, तो इसे पितरों की स्वीकृति और आशीर्वाद का संकेत माना जाता है. माना जाता है कि अगर कौवा भोजन न करे तो इसे अपशकुन समझा जाता है. यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान कौवे को भोजन कराना हर घर में एक महत्वपूर्ण रस्म बन गई है.

रामायण से जुड़ी कथा

कौवे से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध प्रसंग रामायण में आता है. इसे ‘काकासुर कथा’ कहा जाता है. कथा के अनुसार, वनवास के दौरान इंद्रदेव का पुत्र जयंत कौवे का रूप धारण कर माता सीता को परेशान करता है. श्रीराम ने उसे दंड देने के लिए तिनके को ब्रह्मास्त्र का रूप दिया और उसकी आंख फोड़ दी. भयभीत होकर कौवा पूरे संसार में भागा लेकिन कहीं शरण नहीं मिली. अंततः उसने श्रीराम से क्षमा मांगी.

कौवे को मिला वरदान

जब कौवे ने श्रीराम से क्षमा मांगी तो प्रभु ने उसे दंडित करने की बजाय एक वरदान दिया. श्रीराम ने कहा कि अब से हर घर में पितृपक्ष के दौरान होने वाले श्राद्ध और तर्पण के भोजन का एक अंश कौवे को दिया जाएगा. इसे ग्रहण करने के बाद यह भोजन सीधे पितरों तक पहुंचेगा. तभी से पितृपक्ष में कौवे को भोजन देने की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज तक निभाया जा रहा है.

आज की परंपरा

आज भी पितृपक्ष में श्राद्ध करने के बाद भोजन का पहला हिस्सा कौवे के लिए रखा जाता है. लोग मानते हैं कि यदि उस दिन कौवा आकर भोजन कर ले, तो पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं. यह परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है बल्कि समाज में एकता और परंपरा से जुड़े रहने का संदेश भी देती है. इस साल 7 से 21 सितंबर तक चलने वाले पितृपक्ष में भी यही परंपरा निभाई जाएगी.

 Nationalbreaking.com । नेशनल ब्रेकिंग - सबसे सटीक
  1. पितृपक्ष 2025 इस साल 7 से 21 सितंबर तक रहेगा.
  2. इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है.
  3. श्राद्ध के बाद भोजन का एक हिस्सा कौवे के लिए रखा जाता है.
  4. रामायण की ‘काकासुर कथा’ के अनुसार कौवा पितरों का संदेशवाहक है.
  5. मान्यता है कि कौवे को भोजन देने से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं.
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