Tuesday, July 21, 2026
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क्या अनंगपाल तोमर ने बनवाया था कुतुब मीनार? इतिहासकारों की पड़ताल ने खड़े किए सैकड़ों साल पुराने नए सवाल

दिल्ली का इतिहास केवल लाल किले या मुग़ल सल्तनत की दास्तान नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें महाभारत काल के पौराणिक नगर इंद्रप्रस्थ तक जाती हैं। पुराणों में वर्णित इस नगर की पुनर्स्थापना का श्रेय आठवीं शताब्दी में तोमर राजपूतों को दिया जाता है। राजा अनंगपाल तोमर को मध्यकालीन दिल्ली का प्रथम संस्थापक कहा गया है, जिन्होंने यहां शासन की आधारशिला रखी थी।

दिल्ली का स्वरूप धीरे-धीरे राजपूतों के बाद 1206 ईस्वी में तुर्क आक्रांताओं की राजधानी के रूप में बदल गया। यहाँ से शुरू होती है दिल्ली सल्तनत की कहानी – जिसमें खिलजी, तुगलक, सैय्यद और लोदी वंशों ने राज किया। 1526 में बाबर की अगुवाई में मुग़लों का आगमन हुआ, जिन्होंने लगभग तीन शताब्दियों तक शासन किया। इसके बाद 1757 में प्लासी की लड़ाई से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्ज़ा और अंततः 1858 से 1947 तक ब्रिटिश राज की स्थापना रही। 1911 में अंग्रेजों ने दिल्ली को आधिकारिक राजधानी घोषित किया।

अनंगपाल के स्तम्भ पर मंडराता भ्रम

बारहवीं सदी में हरियाणा के जैन कवि बुद्धश्रीधर ने अपने ग्रंथों में इंद्रप्रस्थ में स्थित एक विशाल गगनचुंबी साल (स्तम्भ) का उल्लेख किया है। इतिहासकार प्रो. राजाराम जैन और पं. हरिहरनिवास द्विवेदी जैसे विद्वानों ने इस स्तम्भ की तुलना आज के कुतुब मीनार से की है। उनका दावा है कि यह मीनार राजा अनंगपाल तोमर द्वारा किसी युद्ध विजय की स्मृति में निर्मित कीर्ति स्तम्भ थी, जिसे बाद में दिल्ली पर कब्जा जमाने वाले कुतुबुद्दीन ऐबक ने नष्ट-भ्रष्ट किया और उसी सामग्री से मस्जिद तथा मीनार बनवाए।

कुतुबुद्दीन ऐबक और मस्जिद का निर्माण

दिल्ली के मेहरौली क्षेत्र में स्थित कुतुबमीनार के पास की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के प्रवेशद्वार पर खुदा एक शिलालेख इस बात का प्रमाण देता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने 27 भव्य मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया। शिलालेख में यह भी दर्ज है कि ये मंदिर असाधारण मूल्यों पर निर्मित थे – हर मंदिर लगभग 20 लाख दिल्लीवाल (मुद्रा) की लागत से बना था।

डेली ट्रीब्यून, चंडीगढ़ में 24 अगस्त 1976 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में उल्लेख है कि कुतुबमीनार के जीर्णोद्धार के समय वहां से जैन तीर्थंकरों की 20 मूर्तियां और भगवान विष्णु की एक प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी – जो इस क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक महत्व को दर्शाता है।

ध्रुवतारा से जुड़ा ‘कुतुब’ नाम

कुतुब का मतलब है ध्रुवतारा, यानी स्थिर उत्तरी तारा, जिसे पुराने समय में खगोलशास्त्री मीनार के ऊपर से देखा करते थे। इसे ही देखते हुए मीनार का नाम कुतुब पड़ा। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक की उपस्थिति और दोनों नामों की समानता ने एक भ्रम खड़ा कर दिया, जिसमें लोगों ने यही मान लिया कि वह इस मीनार का निर्माता था।

इतिहासकारों का मानना है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने न सिर्फ हिन्दू-जैन मंदिरों को ध्वस्त किया, बल्कि उन धरोहरों की पहचान मिटाने के लिए उनमें अपनी पहचान घोल दी। कई प्रतिमाएं दीवारों में चुनवा दी गईं, तो कुछ का अस्तित्व ही मिटा दिया गया। बावजूद इसके, समय-समय पर जब खुदाई या अध्ययन होते हैं, तब इन धरोहरों की गवाही खुद इतिहास देता है।

इतिहास की पुनः पड़ताल की जरूरत

विभिन्न साक्ष्यों और अभिलेखों से यह प्रश्न फिर से प्रासंगिक हो गया है कि क्या कुतुब मीनार वास्तव में अनंगपाल द्वारा निर्मित कीर्ति स्तम्भ थी? क्या भारत सरकार को अब इन ऐतिहासिक स्थलों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए?

ऐसे प्रश्नों के उत्तर न केवल सांस्कृतिक सत्य की खोज हैं, बल्कि भारत की असली धरोहरों को पहचान दिलाने की दिशा में भी पहला कदम हो सकते हैं। सत्य चाहे जैसा भी हो, उसे सामने आना ही चाहिए – संप्रदाय से परे, ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर।

डिस्क्लेमर:
यह लेख निशांत मिश्र द्वारा लिखा गया है। इसमें प्रस्तुत सभी तथ्य, विचार और जानकारी लेखक के स्वयं के हैं, जिनकी पूर्ण जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। NationalBreaking.com समाचार पोर्टल का इस लेख की विषयवस्तु से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध नहीं है, न ही पोर्टल इसकी पुष्टि या समर्थन करता है।

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