रविवार, मई 3, 2026
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भारत में रिटेल महंगाई छह साल के निचले स्तर पर, फूड प्राइस में बड़ी गिरावट से बना बैलेंस

पिछले महीने महंगाई दर अचानक से फिसलकर 2.82% पर आ गई। ये आंकड़ा बीते 6 सालों में सबसे कम है। वजह? सीधी-सी, सब्ज़ियां सस्ती हो गई हैं। और जब टमाटर, आलू, प्याज़ जैसे रोज़मर्रा के सामान के दाम नीचे आते हैं, तो उसका असर पूरे महंगाई के आंकड़ों पर दिखता है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक अप्रैल में महंगाई दर 3.16% थी। एक महीने में ही ये 2.82% पर आ गई – ये गिरावट अचानक नहीं, बल्कि कई कारकों का मिला-जुला असर है।

खाद्य महंगाई 1% से भी नीचे

अब अगर खाने-पीने की चीज़ों की बात करें तो, वहाँ भी राहत दिख रही है। मई में फूड इनफ्लेशन 0.98% पर आ गया- ये अक्टूबर 2021 के बाद सबसे कम है। सब्ज़ियों की कीमतें 13.7% तक गिरीं। यानी ये साफ़ है कि सीजनल सप्लाई और बंपर उत्पादन ने अपना असर दिखा दिया।

हालांकि दूध, अनाज, अंडा, मांस-मछली जैसी चीज़ों में थोड़ी बढ़त ज़रूर रही – लेकिन वो इतनी नहीं थी कि पूरी CPI को ऊपर खींच सके। मसाले और तेल जैसे आइटम्स में भी मामूली उतार-चढ़ाव देखा गया, पर कुल तस्वीर राहत देने वाली रही।

RBI ने रुख बदला, कटौती की रेट में

महंगाई के इन आंकड़ों ने रिज़र्व बैंक को भी सोचने पर मजबूर किया। RBI ने अब मौद्रिक नीति में बदलाव करते हुए ‘अनुकूली’ (accommodative) रुख को छोड़कर अब ‘न्यूट्रल’ रुख अपना लिया है। इसके साथ ही रेपो रेट में 50 बेसिस प्वाइंट की कटौती की गई है – मकसद साफ है, अर्थव्यवस्था में थोड़ी रफ्तार लाना।

RBI का कहना है कि अभी तो हालात काबू में हैं, लेकिन आने वाले वक्त में कई चीज़ों पर निगरानी रखनी होगी – जैसे मॉनसून कैसा रहेगा, सप्लाई चेन में कोई बाधा तो नहीं आएगी, और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की चाल कैसी रहेगी।

भारत बनाम बाकी दुनिया

अगर भारत की तुलना बाकी देशों से करें तो तस्वीर और भी साफ़ हो जाती है। कई देशों में महंगाई बेलगाम हो चुकी है। उदाहरण के लिए – वेनेजुएला में 172% से ऊपर महंगाई है। अर्जेंटीना 43.5% पर, तुर्किये 35.41% और नाइजीरिया 22.97% पर है।

इसके उलट चीन और स्विट्ज़रलैंड में महंगाई -0.1% यानी डिफ्लेशन की स्थिति बन गई है। भारत 2.82% पर है, जो कि एक तरह से संतुलन में है – न बहुत ज़्यादा, न बहुत कम।

जनता को मिली थोड़ी राहत, लेकिन…

अब असली सवाल – आम जनता को क्या फर्क पड़ा? तो इसका जवाब थोड़ा मिला-जुला है। सब्ज़ियां, दालें और कुछ जरूरी चीज़ें सस्ती हुई हैं – हाँ, थोड़ा चैन मिला है। लेकिन दूध, पेट्रोल, गैस जैसी चीज़ें अभी भी महंगी बनी हुई हैं, तो खर्चा पूरी तरह कंट्रोल में नहीं आया है।

अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो कुछ महीनों में EMI पर असर दिख सकता है, ब्याज दरें और नीचे आ सकती हैं। और हाँ, अगर इस बार मॉनसून ठीक रहा और ग्लोबल मार्केट शांत रहा, तो फिर राहत और स्थायी हो सकती है।

लेकिन सब कुछ मौसम और बाज़ार के मूड पर टिका है। कहीं बारिश कम हो गई, या तेल के दाम चढ़े, तो वही महंगाई फिर सिर उठा सकती है।

आगे का रास्ता सतर्कता भरा

फिलहाल सरकार और RBI के लिए ये मौका है कि संतुलन बनाए रखें। लोगों को थोड़ी राहत मिली है, लेकिन वो टिकाऊ कब होगी – इसका जवाब वक्त देगा। आर्थिक नीतियां, सप्लाई सिस्टम और मौसम तीनों मिलकर तय करेंगे कि आगे क्या होगा।

यह रिपोर्ट सरकारी आंकड़ों, विशेषज्ञ बयानों और बाजार के मौजूदा हालात के आधार पर तैयार की गई है। किसी निष्कर्ष से पहले आने वाले महीनों पर नज़र रखना ज़रूरी होगा।

सोर्स: Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI), Trading Economics, RBI Policy Statement (June 2025)

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