टोंक के मालपुरा में 25 साल पहले हुए सांप्रदायिक दंगे से जुड़े एक मामले में विशेष अदालत ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने सभी 13 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि इस मामले की जांच गंभीर खामियों से भरी रही। तीन अलग-अलग अधिकारियों ने जांच की, लेकिन किसी ने भी घटना की सही और पूरी पड़ताल नहीं की।
जांच में खामियां उजागर
अदालत के अनुसार, आरोपियों की पहचान को लेकर पुलिस की कार्रवाई अधूरी थी। सिर्फ एक आरोपी की ही शिनाख्त परेड करवाई गई। गवाहों के बयान भी आपस में मेल नहीं खाते थे। कई गवाहों ने खुद कहा कि आरोपियों के चेहरे ढके हुए थे और वे घटना स्थल पर मौजूद ही नहीं थे।
सबूतों का अभाव
आरोपियों के वकीलों ने दलील दी कि पुलिस हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद नहीं कर सकी। घटना के समय इलाके में धारा 144 लागू थी, फिर भी पुलिस द्वारा पेश किए गए गवाह मौके पर मौजूद नहीं थे। इस कारण मामला कमजोर पड़ गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह केस साल 2000 के मालपुरा दंगे से जुड़ा है, जिसमें दो समुदायों के बीच हिंसा हुई थी। एक पक्ष से हरिराम और कैलाश माली की मौत हुई, जबकि दूसरे पक्ष के चार लोगों की जान गई। इस घटना में दोनों पक्षों से केस दर्ज हुए थे।
आरोपियों की स्थिति
कुल 22 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। सात आरोपी 2016 में ही हाईकोर्ट से बरी हो चुके थे, एक की मौत हो गई, और एक नाबालिग का केस जुवेनाइल बोर्ड में चल रहा है। मंगलवार को कोर्ट ने बचे हुए 13 आरोपियों—रामस्वरूप, छोटू बैरवा, किशनलाल गुर्जर, रत्नलाल, किस्तुरिया, कुबड़िया उर्फ रामकिशोर, सत्या उर्फ सत्यनारायण, सुखपाल गुर्जर, पतराज उर्फ बछराज, किशन गुर्जर, देवनारायण उर्फ देवकरण, श्योजी गुर्जर और हीरालाल—को बरी कर दिया।

- 25 साल पुराने मालपुरा दंगा केस में सभी 13 आरोपी बरी हुए।
- अदालत ने पुलिस जांच में गंभीर खामियां पाईं।
- गवाहों के बयान विरोधाभासी और अधूरे रहे।
- हत्या के लिए बताए गए हथियार की बरामदगी नहीं हुई।
- कुल 22 आरोपियों में से 7 पहले ही बरी हो चुके थे।

