शनिवार, मई 2, 2026
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मोहन भागवत बोले- हमें जो इतिहास पढ़ाया जा रहा वह पश्चिमी नजरिए से लिखा गया, भारत को भुलाया गया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को शिक्षा और समाज के स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) और अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के संयुक्त कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि भारत को भारत की नजर से समझा जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज जो इतिहास पढ़ाया जाता है, वह पश्चिमी नजरिए से गढ़ा गया है जिसमें भारत की वास्तविकता और आत्मा का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। भागवत ने कहा कि आज की किताबों में चीन और जापान तो दिखते हैं, लेकिन भारत का योगदान गायब है। “विश्व मानचित्र पर भले भारत हो, पर उनकी सोच में नहीं,” उन्होंने यह कहते हुए शिक्षा में बदलाव की जरूरत पर बल दिया।

तीसरे विश्व युद्ध की आशंका आज भी

संघ प्रमुख ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में कहा कि पहले विश्व युद्ध के बाद भी शांति नहीं आ सकी, और दूसरा विश्व युद्ध भी हुआ। आज जब संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, फिर भी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध को लेकर चिंतित है। भागवत का मानना है कि दुनिया को अब ऐसी दिशा चाहिए जो केवल भारत की जीवन दृष्टि से मिल सकती है।

भौतिक विकास से नहीं मिटी पीड़ा

उन्होंने भौतिकतावाद की आलोचना करते हुए कहा कि विज्ञान और आर्थिक तरक्की ने जरूर सुविधाएं बढ़ाईं, लेकिन मानसिक अशांति, संघर्ष और असमानता अब भी बनी हुई है। विलासिता के साधन बढ़े हैं, पर दुख भी बढ़े हैं। भागवत ने कहा कि गरीब और अमीर के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है, जिससे समाज में असंतुलन पैदा हो रहा है।

भारतीयता: एक सोच, केवल नागरिकता नहीं

मोहन भागवत ने “भारतीयता” की परिभाषा पर रोशनी डालते हुए कहा कि भारत कोई केवल भौगोलिक सीमा या नागरिकता नहीं, बल्कि जीवन की एक संपूर्ण दृष्टि है। यह दृष्टि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चार पुरुषार्थों पर आधारित है, जहां मोक्ष अंतिम लक्ष्य माना जाता है।

“भारत कभी सबसे समृद्ध राष्ट्र था”

भागवत ने कहा कि धर्म आधारित सोच ने ही भारत को कभी सबसे समृद्ध राष्ट्र बनाया था और आज भी पूरी दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। उन्होंने समाज से आग्रह किया कि बदलाव की शुरुआत खुद से और अपने परिवार से की जाए।

आत्ममंथन और आचरण में बदलाव जरूरी

कार्यक्रम के अंत में संघ प्रमुख ने लोगों से आत्ममंथन का आह्वान किया कि क्या वे अपने जीवन में भारतीय मूल्यों और दृष्टिकोण को आत्मसात कर पा रहे हैं? उन्होंने कहा कि बदलाव के लिए केवल शिक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी भारतीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

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