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बंगाल फाइल्स रिव्यू: खून-खराबे और हिंसा से भरी फिल्म, जानें कैसा रहा दर्शकों का रिएक्शन

फिल्म द बंगाल फाइल्स आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। विवेक रंजन अग्निहोत्री की इस फिल्म में 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली दंगों को दिखाया गया है। फिल्म की शुरुआत आजादी के 78 साल बाद के भारत से होती है और कहानी फ्लैशबैक में जाकर दंगों और विभाजन के हालात को सामने लाती है। फिल्म में खून-खराबा, हिंसा और दंगों को इतनी गहराई से दिखाया गया है कि कई जगह दर्शकों के लिए इसे देखना मुश्किल हो जाता है।

फिल्म की कहानी

द बंगाल फाइल्स की शुरुआत आजादी के 78 साल बाद के भारत से होती है। यहां सीबीआई चीफ राजेश सिंह, आईपीएस शिवा पंडित को एक दलित लड़की के गायब होने का केस सौंपते हैं। कहानी बंगाल के मुर्शिदाबाद की है, जहां राजनीति, अपराध और इतिहास की परतें खुलती हैं। केस के मुख्य संदिग्ध भारती बनर्जी और एमएलए सरदार हुसैनी हैं। भारती डिमेंशिया की मरीज है, लेकिन उसके पास अतीत के कई राज हैं। यहीं से फिल्म दर्शकों को फ्लैशबैक में ले जाती है, जहां डायरेक्ट एक्शन डे और बंगाल दंगे की त्रासदी दिखाई जाती है।

डायरेक्ट एक्शन डे की त्रासदी

फिल्म का अहम हिस्सा 16 अगस्त 1946 को हुए डायरेक्ट एक्शन डे पर केंद्रित है। मुस्लिम लीग प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने के लिए आंदोलन छेड़ते हैं। गांधी और कांग्रेस इसके खिलाफ खड़े होते हैं। इसके बाद कोलकाता में आंदोलन हिंसक हो जाता है और नरसंहार की तस्वीरें सामने आती हैं। लाखों लोगों ने अपनों को खोया। फिल्म में इन दृश्यों को बेहद हिंसक अंदाज में दिखाया गया है। भारती बनर्जी के किरदार के जरिए उस दौर का दर्द और त्रासदी दर्शकों तक पहुंचती है।

खून-खराबे से भरे दृश्य

विवेक अग्निहोत्री ने फिल्म में हिंसा को केंद्र में रखा है। तीन घंटे से ज्यादा लंबी इस फिल्म में बच्चों पर हमले, लोगों की हत्या और अमानवीय अत्याचार को विस्तार से दिखाया गया है। खून-खराबे के इतने दृश्य हैं कि दर्शकों का मन भारी हो जाता है। कहीं गोलियों से मासूमों की जान ली जाती है, तो कहीं लोगों को बेरहमी से कुचला जाता है। फिल्म देखते हुए कई बार ऐसा लगता है कि कहानी से ज्यादा हिंसा दिखाने पर ध्यान दिया गया है।

कलाकारों का अभिनय

फिल्म में कई दिग्गज कलाकारों ने काम किया है। दर्शन कुमार ने शिवा पंडित की भूमिका निभाई, लेकिन उनकी परफॉरमेंस बहुत खास नहीं रही। पल्लवी जोशी ने उम्रदराज भारती बनर्जी का किरदार निभाकर प्रभावित किया। सिमरत कौर ने युवा भारती के रोल में दमदार काम किया और भावनाओं को बखूबी दिखाया। मिथुन चक्रवर्ती भ्रष्ट पुलिस अफसर के रूप में जमे, वहीं नमाशी चक्रवर्ती ने सरदार हुसैनी का रोल जोरदार अंदाज में निभाया। राजेश खेर जिन्ना के किरदार में ठीक रहे, जबकि अनुपम खेर का गांधी का रोल फीका पड़ गया।

फिल्म का असर और समीक्षा

फिल्म की लंबाई और हिंसा इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, लेकिन कहानी दर्शकों को बांध नहीं पाती। हर सीन में खून-खराबा और अत्याचार होने से दर्शक थकान और असहजता महसूस करते हैं। कई जगह यह सवाल उठता है कि सेंसर बोर्ड ने इतने हिंसक दृश्यों को पास कैसे किया। फिल्म भावनात्मक असर डालने की कोशिश करती है, लेकिन कहानी कमजोर और बेहद लंबी होने की वजह से दर्शकों को जुड़ाव नहीं हो पाता।

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  1. द बंगाल फाइल्स रिलीज हुई, जिसमें 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और दंगों की कहानी है।
  2. फिल्म की शुरुआत आजादी के 78 साल बाद के भारत से होती है।
  3. विवेक अग्निहोत्री ने हिंसा और खून-खराबे को विस्तार से दिखाया है।
  4. कलाकारों में पल्लवी जोशी और सिमरत कौर का अभिनय सबसे प्रभावी रहा।
  5. लंबी फिल्म और ज्यादा हिंसा के चलते दर्शकों को कहानी कमजोर लगी।
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